
फिर लौट आया है बसंत,
भौंरों को फूलों से मिलाने ।
फिर लौट आया है बसंत ,
खेत में सरसों के पीले फूलों की चादर ओढाने ।
फिर लौट आया है बसंत,
खेतों की मुंडेरों पर , लाल , पीले, नीले और
ढेरों प्यारे फूल उगाने ।
हां !
फिर लौट आया है बसंत ,
घुघूती चिड़िया , फूलारी और हजारों यादें लौटाने।
बसंत कराता है हमें अहसास ,
प्रकृति में हो रही कायापलट छठा का ।
हां ………
वहीं आदर्श मौसम ,
हवा बिखेरती अपनी खुशबू ,
मन में जुड़ता कोई नया साज सा ।
पेड़ करने लगे हैं पवन से बातें ,
स्नेह के बादल छा रहे हैं अनन्त में ,
सजने लगी है ‘ वधु ’ बन अब वनस्थली भी ।
जानती हूं मैं अपने अनुभव से ,
लौट आया है बसंत ,
फिर कुछ नया सिखाने ।