
पर !
भूल बैठी अस्तित्व अपना ।
मैं …….
मैं प्राप्त करने आई थी आत्मज्ञान,
पर !
चाह बैठी हूं धन,लोभ, यश और ये संसार।
मैं ! मेरा मन, घिरा है तिमिर के अंधकार में ,
पर ,
देखना चाहती हूं मैं,अपने अंदर छुपे उस ,
प्रकाशमय तेज को ।
जिसके बारे में सुना है मैंने ।
मैं !
ढूंढना चाहती हूं अपनी शाम,
पर !
क्यों खो रही हूं मैं , प्रातः में ही ?
लगता है इन स्मृतियों के भवसागर में मैं फसती चली जा रही हूं !
हे ईश्वर,
गुजार दिए इसी खोज में, कई दिन…
कई महीने, कई साल ।
फिर भी !
कट तो रही है जिंदगी !
मगर ,
एक जिज्ञासा है मन में की ,
जानना है कुछ तो !
जानना है खुद को ,
और मिटा देना है , मै का अहंकार ।