वह स्त्री हिमालय-सी है—
अचल, विराट, प्रेम और सुंदरता की मूरत,
अगम्य साहस का प्रतीक।
इतिहास, भूगोल, युग, समय,
सुख दुख और चारों युग—सब उसी पर टिके हैं।
लकड़ियों में खाना बनाती हुई,
चारा लाती हुई,
बोझ और भारे उठाती हुई,
घर संभालती हुई,
संघर्षों से घिरी हुई,
मिट्टी से चूल्हे को लीपती हुई—
वह स्त्री।
खुद किस मिट्टी से बनी होगी?
यही सोचता है आज वह ,
अचल मौन खड़ा हिमालय।